Quran-E-Pak

सूरा-अल-अहज़ाब | Surah 33

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सूरा-अल-अहज़ाब

| मदीना कालीन | आयत 73 | 

लश्कर 

सूरा-अल-अहज़ाब | Surah 33

अल्लाह के नाम से जो बहुत मेहरबान, रहम करने वाला है।

ऐ नबी (स)! अल्लाह से डरते रहें, और काफ़िरों और मुनाफ़िकों का कहा न मानें, बेशक अल्लाह जानने वाला, हिक्मत वाला है। (1) 

और पैरवी करें जो वहि किया जाता है आप (स) को आप (स) के रब की तरफ़ से, बेशक अल्लाह उस से बा खबर है जो तुम करते हो। (2) 

और आप (स) अल्लाह पर भरोसा रखें, अल्लाह काफ़ी है कार साज| (3) 

अल्लाह ने नहीं बनाए किसी आदमी के लिए उस के सीने में दो दिल, और तुम्हारी उन बीवियों को जिन्हें तुम माँ कह बैठते हो नहीं बनाया तुम्हारी माएं, और तुम्हारे मुँह बोले (ले पालकों को) (सच मुच) तुम्हारे बेटे नहीं बनाया, यह (सिर्फ तुम्हारे मुँह से कहने (की बात है। और अल्लाह हक़ फ़रमाता है, और वह रास्ते की हिदायत देता है। (4) 

उन्हें उन ही के बापों की तरफ़ (मन्सूब कर के) पुकारो, यह अल्लाह के नजदीक जियादा (करीने) इंसाफ़ है, फिर अगर तुम उन के बापों को न जानते हो तो वह तुम्हारे दीनी भाई हैं, और वह तुम्हारे रफ़ीक है, और तुम पर नहीं उस में कोई गुनाह जो तुम से भूल चूक हो चुकी, लेकिन (हां) जो अपने दिल के इरादे से करो, और अल्लाह बख्शने वाला, मेहबान है। (5) 

नबी (स) मोमिनों के लिए उन के अपने नफ्स से ज़ियादा हक़दार हैं और आप (नबी स) की बीवीयां उन (मोमिनों) की मॉएं है, और क़राबतदार अल्लाह की किताब में बाज़ (आम) मुसलमानों और मुहाजिरों की बनिस्बत एक दूसरे से ज़ियादा नजदीक (फ़ाइक) है मगर यह कि तुम करो अपने दोस्तों के साथ हुस्ने सुलूक, यह (अल्लाह की) किताब में लिखा हुआ है। (6) 

और (याद करो) जब हम ने लिया नबियों से उन का अहद, और तुम से (भी लिया) और वह नूह (अ) से और इब्राहीम (अ) से और मूसा (अ) और मरयम (अ) के बेटे ईसा (अ) से, और हम ने उन से पुख्ता अहद लिया। (7) 

ताकि वह (उन) सच्चों से उन की सच्चाई (के बारे में सवाल करे, और उस ने काफिरों के लिए दर्दनाक अज़ाब तैयार किया है। (8) 

ऐ ईमान वालो! अपने ऊपर अल्लाह की नेमत (उस का एहसान) याद करो जब तुम पर बहुत से लशकर चढ़ आए तो हम ने उन पर आन्धी भेजी और (ऐसे) लशकर जिन्हें तुम ने न देखा, और अल्लाह उसे देखने वाला है जो तुम करते हो। (9) 

जब वह तुम पर (चढ़) आए तुम्हारे ऊपर (की तरफ़) से और तुम्हारे नीचे (की तरफ़) से, और जब आँखें चुन्धिया गईं, और दिल गलों में (कलेजे मुँह को) आने लगे और तुम अल्लाह के बारे में (तरह तरह के) गुमान कर रहे थे। (10) 

यहां (इस मौके पर मोमिन आज़माए गए और वह शदीद हिलाए (झिन्झोड़े) गए। (11)

और जब कहने लगे मुनाफ़िक और वह जिन के दिलों में रोग हैः हम से अल्लाह और उस के रसूल (स) ने जो वादा किया वह सिर्फ धोका था। (12) 

और जब एक गिरोह ने कहा उन में से, ऐ मदीने वालों! तुम्हारे लिए कोई जगह (ठिकाना) नहीं, लिहाज़ा तुम लौट चलो, और उन में से एक गिरोह इजाजत मांगता था नबी (स) से, वह कहते थे कि हमारे घर बेशक गैर महफूज हैं, हालांकि वह गैर महफूज नहीं हैं, वह तो सिर्फ फ़िरार चाहते हैं। (13)

और अगर (दुश्मन) उन पर मदीने के अतराफ़ से दाखिल हो जाएं (आ घुसें) फिर उन से फ़साद चाहा जाए। (कहा जाए, तो वह उसे ज़रूर देंगे (मन्जूर कर लेंगे) और घरों में सिर्फ थोड़ी सी देर लगाएंगे। (14) 

हालांकि वह इस से पहले अल्लाह से अहद कर चुके थे कि वह पीठ न फेरेंगे, और अल्लाह से किया हुआ अहद पूछा जाने वाला है। (15) 

आप (स) फ़रमा देंः फिरार तुम्हें हरगिज़ नफा न देगा अगर तुम मौत या कृतल से भागे, और उस सूरत में तुम सिर्फ थोड़ा (चन्द दिन) फाइदा दिए जाओगे। (16) 

आप (स) फ़रमा देंः वह कौन है जो तुम्हें अल्लाह से बचा सकता? अगर वह तुम से बुराई (करना) चाहे या तुम पर मेहरबानी करना चाहे और वह अपने लिए अल्लाह के सिवा कोई दोस्त न पाएंगे और न मददगार| (17) 

अल्लाह खूब जानता है तुम में से (दूसरों को जिहाद से) रोकने वालों को, और अपने भाइयों से यह कहने वालों को कि हमारी तरफ आजाओ, और वह लड़ाई में नहीं आते मगर बहुत कम। (18) 

तुम्हारा साथ देने में बख़ीली करते हैं, फिर जब खौफ़ आए तो तुम उन्हें देखोगे कि वह तुम्हारी तरफ (D) देखने लगते हैं (जैसे) उन की आँखें घूम रही हैं उस शख्स की तरह जिस पर मौत की गशी (तारी) हो, फिर जब खौफ चला जाए तो तुम्हें ताने देने लगें तेज़ ज़बानों से, माल पर बखीली करते हुए, यह लोग ईमान नहीं लाए, तो अल्लाह ने अकारत कर दिए उन के अमल, और अल्लाह पर यह आसान है। (19) 

वह गुमान करते हैं कि (काफिरों के) लशकर (अभी) नहीं गए हैं, और अगर लशकर (दोबारा) आएं तो वह तमन्ना करें कि काश वह देहात में बाहर निकले होते (सेहरा नशीन होते) तुम्हारी ख़बरें पूछते रहते और अगर तुम्हारे दरमियान हों तो जंग न करें मगर बहुत कम| (20) 

यक़ीनन तुम्हारे लिए है अल्लाह के रसूल (स) में एक बेहतरीन नमूना, (हर) उस शख्स के लिए जो अल्लाह और रोजे आखिरत पर उम्मीद रखता है, और अल्लाह को बकसरत याद करता है। (21) 

और जब मोमिनों ने लशकरों को देखा तो वह कहने लगेः यह है जिस का हमें अल्लाह और उस के रसूल ने वादा दिया था, और अल्लाह और उस के रसूल (स) ने सच कहा था, और (उस सूरते हाल ने) उन में ज़ियादा न किया मगर ईमान और फरमांबरदारी (का जज़बा)। (22) 

मोमिनों में कुछ ऐसे आदमी हैं कि उन्हों ने अल्लाह से जो अहद किया था वह सच कर दिखाया, सो उन में से (कुछ हैं, जो अपनी नज़र पूरी कर चुके, और उन में (कुछ है, जो इन्तिज़ार में हैं, और उन्हों ने कुछ भी तबदीली नहीं की। (23) 

(यह इस लिए हुआ कि अल्लाह जज़ा दे सच्चे लोगों को उन की सच्चाई की, और अगर वह चाहे तो मुनाफ़िकों को अज़ाब दे या वह उन की तौबा कुबूल कर ले, बेशक अल्लाह बख्शने वाला, मेहरबान है। (24)

और अल्लाह ने काफिरों को लौटा दिया उन के (अपने) गुस्से में भरे हुए, उन्हों ने कोई भलाई न पाई, और जंग (के मामले में) मोमिनों के लिए अल्लाह काफ़ी है, और अल्लाह है तवाना और गालिब | (25)

और अहले किताब में से जिन्हों ने उन की मदद की थी, उस ने उन्हें उन के किलों से उतार दिया. और उन के दिलों में रुअब डाल दिया, एक गिरोह को तुम क़त्ल करते हो और एक गिरोह को कैद करते हो। (26) 

और तुम्हें वारिस बना दिया उन की जमीन का, और उन के घरों का, और उन के मालों का, और उस जमीन का जहां तुम ने क़दम नहीं रखा था, और अल्लाह है हर शै पर कुदरत रखने वाला। (27) 

ऐ नबी (स)! आप (स) अपनी बीवियों से फ़रमा दें, अगर तुम दुनिया की जिन्दगी और उस की जीनत चाहती हो तो आओ, मैं तुम्हें कुछ देदूं और रुखसत कर दूं अच्छी तरह रुखसत| (28) 

और अगर तुम अल्लाह और उस का रसूल (स) और आखिरत का घर चाहती हो तो बेशक अल्लाह ने तुम में से नेकी करने वालियों के लिए अजरे अजीम तैयार कर रखा है। (29) 

ऐ नबी (स) की बीवियो! जो कोई तुम में से खुली बेहूदगी की मुर्तकिब हो तो उस के लिए अजाब दो चन्द बढ़ा दिया जाएगा, और यह अल्लाह पर आसान है। (30) 

और तुम में से जो अल्लाह और उस के रसूल (स) की इताअत करे और नेक अमल करे हम उसे उस का दोहरा अजर देंगे और हम ने उस के लिए इज्जत का रिजक तैयार किया है। (31) 

ऐ नबी (स) की बीवियो! औरतों में से तुम किसी एक की तरह (आम) नहीं हो, अगर तुम परहेज़गारी इख्तियार करो तो गुफ्तगू में मुलाइमत न करो कि जिस के दिल में खोट है वह लालच (ख़याले फ़ासिद) करे और तुम बात करो माकूल बात। (32) 

और अपने घरों में करार पकड़ो, और अगले ज़माना-ए-जाहिलियत के बनाव सिंगार का इजहार करती न फिरो, और नमाज़ काइम करो, और जकात देती रहो, और अल्लाह और उस के रसूल (स) की इताअत करो, बेशक अल्लाह चाहता है कि वह तुम से आलूदगी दूर फ़रमा दे ऐ अहले बैत! और तुम्हें खूब (हर तरह से) पाक और साफ़ रखे| (33)

और तुम याद रखो जो तुम्हारे घरों में अल्लाह की आयतें और हिक्मत (दानाई की बातें) पढ़ी जाती हैं, बेशक अल्लाह बारीक बीन, बाख़बर है। (34) 

बेशक मुसलमान मर्द और मुसलमान औरतें, और मोमिन मर्द और मोमिन औरतें, और फरमाबरदार मर्द और फ़रमांबरदार औरतें, और रास्तगो मर्द और रास्तगो औरतें, और सबर करने वाले मर्द और सबर करने वाली औरतें, और आजिज़ी करने वाले मर्द और आजिज़ी करने वाली औरतें, और सदका (खैरात) करने वाले मर्द और सदका (खैरात) करने वाली औरतें, और रोज़ा रखने वाले मर्द और रोज़ा रखने वाली औरतें, और हिफाजत करने वाले मर्द । अपनी शर्मगाहों की, और हिफाज़त करने वाली औरतें, और अल्लाह को बकस्रत याद करने वाले मर्द और (अल्लाह को) याद करने वाली औरतें, अल्लाह ने उन (सब) के लिए तैयार की है बखशिश और अजरे अजीम| 35) 

और (गुन्जाइश) नहीं है किसी मोमिन मर्द और न किसी मोमिन औरत के लिए कि जब फैसला कर दें अल्लाह और उस के रसूल (स) किसी मामले का, कि उन के लिए उस मामले में कोई इखतियार बाकी हो, और जो नाफरमानी करेगा, अल्लाह और उस के रसूल (स) की तो अलबत्ता वह सरीह गुमराही में जा पड़ा। (36) 

और याद करो जब आप (स) उस शख्स [जैद बिन हारिसा] को फ़रमाते थे जिस पर अल्लाह ने इन आम किया और आप (स) ने भी उस पर इन्आम किया कि अपनी बीवी [जैनब १] को अपने पास रोके रख और अल्लाह से डर, और आप (स) छुपाते थे अपने दिल में वह (बात) जिसे अल्लाह जाहिर करने वाला था और आप (स) लोगों (के तअन) से डरते थे और अल्लाह ज़ियादा हकदार है कि तुम उस से डरो, फिर जब जैद ने उस [जैनब] से अपनी हाजत पूरी कर ली तो हम ने उसे आप (स) के निकाह में दे दिया, ताकि मोमिनों पर कोई तंगी न रहे अपने ले पालकों की बीवियों (से निकाह करने में) जब वह उन से अपनी हाजत पूरी कर लें (तलाक दे दें) और अल्लाह का हुक्म (पूरा हो कर) रहने वाला है। (37) 

नबी पर उस काम में कोई हरज (तंगी) नहीं है जो अल्लाह ने उस के लिए मुकर्रर किया, अल्लाह का (यही) दस्तूर (रहा है। उन में जो पहले गुज़रे हैं और अल्लाह का हुक्म (सहीह) अन्दाजे से मुकर्रर किया हुआ है। (38) 

वह जो अल्लाह के पैगामात पहुंचाते हैं और वह उस से डरते हैं और अल्लाह के सिवा किसी से नहीं डरते, और अल्लाह काफ़ी है हिसाब लेने वाला। (39) 

मुहम्मद (स) तुम्हारे मदों में से किसी के बाप नहीं हैं, लेकिन वह अल्लाह के रसूल और (सब) नबियों पर मुहर (आखरी नबी) हैं और अल्लाह हर शै का जानने वाला है। (40)

ऐ ईमान वालो! तुम अल्लाह को याद करो बकस्रत। (41)

और सुबह और शाम उस की पाकीज़गी बयान करो। (42) 

वही है जो तुम पर रहमत भेजता है और उस के फरिश्ते (भी) ताकि वह तुम्हें अंधेरों से नूर की तरफ़ निकाल लाए, और अल्लाह मोमिनों पर मेहरबान है। (43) 

उन का इस्तिकबाल जिस दिन वह उस को मिलेंगे “सलाम" से होगा, और उस ने उन के लिए बड़ा अच्छा अजर तैयार किया है। (44) 

ऐ नबी (स)! बेशक हम ने आप (स) को भेजा है गवाही देने वाला और खुशखबरी देने वाला और डर सुनाने वाला। (45) 

और उस के हुक्म से अल्लाह की तरफ़ बुलाने वाला, और रोशन चिराग | (46)

और आप (स) मोमिनों को यह खुशखबरी दें कि उन के लिए अल्लाह की तरफ़ से बड़ा फज्ल है। (47) 

और आप (स) कहा न मानें काफिरों और मुनाफिकों का, और आप (स) उन के ईजा देने का खयाल न करें और अल्लाह पर भरोसा करें| और काफ़ी है अल्लाह कारसाज़ | (48) 

ऐ ईमान वालो! जब तुम मोमिन औरतों से निकाह करो, फिर तुम उन्हें उस से पहले तलाक़ दे दो कि तुम उन्हें हाथ लगाओ तो उन पर तुम्हारा (कोई हक) नहीं कि उन की इद्दत पूरी कराओ, पर उन्हें कुछ सामान दे दो और रुखसत । कर दो अच्छी तरह रुखसत। (49) 

ऐ नबी (स)! हम ने तुम्हारे लिए हलाल की तुम्हारी वह बीवियां जिन को तुम ने उन का मेहर दे दिया, और तुम्हारी कनीजें उन में से जो अल्लाह ने (गनीमत में से) तुम्हारे हाथ लगा दी और तुम्हारे चचाओं की बेटियां, और तुम्हारी फुफियों की बेटियां, और तुम्हारे मामूओं की बेटियां, और तुम्हारी खालाओं की बेटियां, वह जिन्हों ने तुम्हारे साथ हिजत की, और वह मोमिन औरत जो अपने आप को नबी (स) की नजर कर दे, अगर नबी (स) उसे निकाह में लेना चाहे, यह आम मोमिनों के अलावा खास तुम्हारे लिए है, अलबत्ता हमें मालूम है जो हम ने उन की औरतों और कनीजों (के बारे) में उन पर फर्ज किया है, ताकि तुम पर कोई तंगी न रहे, और अल्लाह बख्शने वाला, मेहबान है। (50) 

आप (स) जिस को चाहें दूर रखें उन में से, और जिसे चाहें अपने पास रखें, और उन में से जिस को आप (स) ने दूर कर दिया था आप (फिर) तलब करें तो कोई तंगी (हरज) नहीं आप (स) पर, यह जियादा करीब है कि (उस से) उन की आँखें ठंडी रहें और वह आजुर्दा न हों, और वह सब की सब उस पर राज़ी रहें जो आप उन्हें दें, और अल्लाह जानता है जो तुम्हारे दिलों में है, और अल्लाह जानने वाला बुर्दबार है। (51) 

हलाल नहीं आप (स) के लिए इस के बाद (और) औरतें, और न यह कि आप (स) उन से और औरतें बदल लें अगरचे आप (स) को अच्छा लगे उन का हुस्न, सिवाए आप (स) की कनीजे, और अल्लाह हर शै पर निगहबान है। (52) 

ऐ ईमान वालो! तुम नबी (स) के घरों में दाखिल न हो, सिवाए इस के कि तुम्हें इजाज़त दी जाए खाने के लिए, उस के पकने की राह न तको, लेकिन जब तुम्हें बुलाया जाए तो तुम दाखिल हो, फिर जब तुम खाना खालो तो तुम मुन्तशिर हो जाया करो, और बातों के लिए जी लगा कर न बैठे रहो| बेशक तुम्हारी यह बात नबी (स) को ईज़ा देती है, पर वह तुम से शर्माते हैं, और अल्लाह हक़ बात (फ़रमाने) से नहीं शर्माता, और जब तुम उन (नबी (स) की बीवियों) से कोई शै मांगो तो उन से पर्दे के पीछे से मांगो, यह बात तुम्हारे और उन के दिलों के लिए ज़ियादा पाकीज़गी का ज़रीआ है, और तुम्हारे लिए जाइज़ नहीं कि तुम अल्लाह के रसूल (स) को ईज़ा दो, और न यह (जाइज़ है। कि उन के बाद कभी भी उन की बीवियों से तुम निकाह करो, बेशक तुम्हारी यह बात अल्लाह के नजदीक बड़ा (गुनाह) है। (53) 

अगर तुम कोई बात जाहिर करो या उसे छुपाओ तो बेशक अल्लाह हर शै का जानने वाला है। (54)

औरतों पर गुनाह नहीं (पर्दा न करने में) अपने बाप, और न अपने बेटों, और न अपने भाइयों, और न अपने भाइयों के बेटों, और न अपनी बहनों के बेटों, और न अपनी औरतों से, और न अपनी कनीज़ों से, (ऐ औरतो) तुम अल्लाह से डरती रहो, बेशक अल्लाह हर शै पर गवाह (मौजूद) है। (55) 

बेशक अल्लाह और उस के फ़रिश्ते नबी (स) पर दरूद भेजते हैं, ऐ ईमान वालो! तुम भी उस पर दरूद भेजो और खूब सलाम भेजो। (56) 

बेशक जो लोग अल्लाह को और उस के रसूल (स) को ईज़ा देते हैं अल्लाह ने उन पर दुनिया और आखिरत में लानत की (अपनी रहमत से महरूम कर दिया) और उनके लिए रुस्वा करने वाला अज़ाब तैयार किया। (57) 

और जो लोग मोमिन मदर्दी और मोमिन औरतों को ईज़ा देते हैं, बगैर उस के कि उन्हों ने कुछ किया हो तो अलबत्ता उन्हों ने उठाया (अपने सर लिया) बुहतान और सरीह गुनाह। (58) 

ऐ नबी (स)! आप (स) अपनी बीवियों और अपनी बेटियों को, और मोमिनों की औरतों को फरमा दें कि वह अपने ऊपर अपनी चादरें डाल लिया करें (धूंघट निकाल लिया करें) यह (उस से) क़रीब तर है कि उन की पहचान हो जाए, तो उन्हें न सताया जाए, और अल्लाह बख्शने वाला, निहायत मेहरबान है। (59) 

अगर बाज़ न आए मुनाफ़िक और वह लोग जिन के दिलों में रोग है, और मदीने में झूटी अफवाहें उड़ाने वाले, तो हम ज़रूर तुम्हें उन के पीछे लगा देंगे, फिर वह इस शहर (मदीना) में चन्द दिन के सिवा तुम्हारे हमसाया (पास) न रहेंगे| (60) 

फिटकारे हुए, वह जहाँ कहीं पाए जाएंगे पकड़े जाएंगे, और बुरी तरह मारे जाएंगे। (61) 

अल्लाह का (यही) दस्तूर रहा है, उन लोगों में जो गुज़रे हैं इन से पहले, और तुम अल्लाह के दस्तूर में हरगिज़ कोई तबदीली न पाओगे| (62) 

आप (स) से लोग कियामत के बारे में सवाल करते हैं। आप (स) फ़रमा दें इस के सिवा नहीं कि उस का इल्म अल्लाह के पास है, और तुम्हें क्या ख़बर! शायद कियामत करीब (ही) हो। (63) 

बेशक अल्लाह ने काफ़िरों पर लानत की, और उन के लिए (जहन्नम की) भड़कती हुई आग तैयार की है। (64) 

वह उस में हमेशा हमेशा रहेंगे, वह न कोई दोस्त पाएंगे, और न मददगार। (65) 

जिस दिन उन के चेहरे आग में उलट पुलट किए जाएंगे, वह कहेंगे ऐ काश! हम ने इताअत की होती अल्लाह की, और इताअत की होती रसूल (स) की| (66) 

और वह कहेंगे, ऐ हमारे रब! बेशक हम ने इताअत की अपने सरदारों की और अपने बड़ों की, तो उन्हों ने हमें रास्ते से भटकाया। (67) 

ऐ हमारे रब! उन्हें दुगना अजाब दे और उन पर बड़ी लानत कर| (68) 

ऐ ईमान वालो! उन लोगों की तरह न होना जिन्हों ने मूसा (अ) को (इल्ज़ाम लगा कर) सताया तो बरी कर दिया उस को अल्लाह ने उस से जो उन्हों ने कहा (इलज़ाम लगाया), और वह (मूसा अ) अल्लाह के नजदीक बाआबरू थे। (69) 

ऐ ईमान वालो! अल्लाह से डरो और सधिी बात कहो। (70) 

वह तुम्हारे लिए तुम्हारे अमल संवार देगा, और तुम्हारे गुनाह बख्श देगा, और जिस ने अल्लाह और उस के रसूल (स) की इताअत की तो वह बड़ी मुराद को पहुँचा। (71) 

बेशक हम ने अपनी अमानत (जिम्मेदारी को) पेश किया आस्मानों और जमीन और पहाड़ों पर, तो उन्हों ने उस के उठाने से इन्कार किया, और वह उस से डर गए, और इन्सान ने उसे उठा लिया, बेशक वह जालिम, बड़ा नादान था। (72) 

ताकि अल्लाह अज़ाब दे मुनाफ़िक मी और मुनाफिक औरतों को, और मुश्रिक मदों और मुश्रिक औरतों को, और अल्लाह तौबा कुबूल करे मोमिन मर्दो और मोमिन औरतों की, बेशक अल्लाह बख्शने वाला मेहरबान है। (73)

***

33. THE CONFEDERATES

(al-Ahzab)

In the name of God, the Gracious, the Merciful.


1. O Prophet! Fear God, and do not obey the unbelievers and the hypocrites. God is Knowledgeable and Wise.


2. And follow what is revealed to you from your Lord. God is fully aware of what you do.


3. And put your trust in God. God is enough as a trustee.


4. God did not place two hearts inside any man's body. Nor did He make your wives whom you equate with your mothers, your actual mothers. Nor did He make your adopted sons, your actual sons. These are your words coming out of your mouths. God speaks the truth and guides to the path.


5. Call them after their fathers; that is more equitable with God. But if you do not know their fathers, then your brethren in faith and your friends. There is no blame on you if you err therein, barring what your hearts premeditates. God is Forgiving and Merciful.


6. The Prophet is more caring of the believers than they are of themselves, and his wives are mothers to them. And blood relatives are closer to one another in God’s Book than the believers or the emigrants, though you should do good to your friends. That is inscribed in the Book.


7. Recall that We received a pledge from the prophets, and from you, and from Noah, and Abraham, and Moses, and Jesus son of Mary. We received from them a solemn pledge.


8. That He may ask the sincere about their sincerity. He has prepared for the disbelievers a painful punishment.


9. O you who believe! Remember God’s blessings upon you, when forces came against you, and We sent against them a wind, and forces you did not see. God is Observant of what you do.


10. When they came upon you, from above you, and from beneath you; and the eyes became dazed, and the hearts reached the throats, and you harbored doubts about God.


11. There and then the believers were tested, and were shaken most severely.


12. When the hypocrites and those in whose hearts is sickness said, “God and His Messenger promised us nothing but illusion.”


13. And when a group of them said, “O people of Yathrib, you cannot make a stand, so retreat.” And a faction of them asked the Prophet to excuse them, saying, “Our homes are exposed,” although they were not exposed. They only wanted to flee.


14. Had it been invaded from its sides, and they were asked to dissent, they would have done so with little hesitation.


15. Although they had made a pledged to God, in the past, that they will not turn their backs. A pledge to God is a responsibility.


16. Say, “Flight will not benefit you, if you flee from death or killing, even then you will be given only brief enjoyment.”


17. Say, “Who is it who will shield you from God, if He intends adversity for you, or intends mercy for you?” Besides God, they will find for themselves neither friend nor helper.


18. God already knows the hinderers among you, and those who say to their brethren, “Come and join us.” Rarely do they mobilize for battle.


19. Being stingy towards you. And when fear approaches, you see them staring at you—their eyes rolling—like someone fainting at death. Then, when panic is over, they whip you with sharp tongues. They resent you any good. These have never believed, so God has nullified their works; a matter easy for God.


20. They assumed that the confederates had not withdrawn. But were the confederates to advance, they would wish they were in the desert with the Bedouins, inquiring about your news. And if they were among you, they would have done little fighting.


21. You have an excellent example in the Messenger of God; for anyone who seeks God and the Last Day, and remembers God frequently.


22. And when the believers saw the confederates, they said, “This is what God and His messenger have promised us; and God and His messenger have told the truth.” And it only increased them in faith and submission.


23. Of the believers are men who are true to what they pledged to God. Some of them have fulfilled their vows; and some are still waiting, and never wavering.


24. That God may reward the truthful for their truthfulness; and punish the hypocrites, if He wills, or pardon them. God is Forgiving and Merciful.


25. God repelled the disbelievers in their rage; they gained no advantage. God thus  spared the believers combat. God is Strong and Mighty.


26. And He brought down from their strongholds those of the People of the Book who backed them, and He threw terror into their hearts. Some of them you killed, and others you took captive.


27. And He made you inherit their land, and their homes, and their possessions, and a region you have never stepped on. God has power over all things.


28. O Prophet! Say to your wives, “If you desire the life of this world and its finery, then let me compensate you, and release you kindly. 29. But if you desire God, His Messenger, and the Home of the Hereafter, then God has prepared for the righteous among you a magnificent compensation.”


30. O wives of the Prophet! Whoever of you commits a proven indecency, the punishment for her will be doubled. And that would be easy for God.


31. But whoever of you remains obedient to God and His Messenger, and acts righteously, We will give her a double reward; and We have prepared for her a generous provision.


32. O wives of the Prophet! You are not like any other women, if you observe piety. So do not speak too softly, lest the sick at heart lusts after you, but speak in an appropriate manner.


33. And settle in your homes; and do not display yourselves, as in the former days of ignorance. And perform the prayer, and give regular charity, and obey God and His Messenger. God desires to remove all impurity from you, O People of the Household, and to purify you thoroughly.


34. And remember what is recited in your homes of God's revelations and wisdom. God is Kind and Informed.


35. Muslim men and Muslim women, believing men and believing women, obedient men and obedient women, truthful men and truthful women, patient men and patient women, humble men and humble women, charitable men and charitable women, fasting men and fasting women, men who guard their chastity and women who guard, men who remember God frequently and women who remember—God has prepared for them a pardon, and an immense reward.


36. It is not for any believer, man or woman, when God and His Messenger have decided a matter, to have liberty of choice in their decision. Whoever disobeys God and His Messenger has gone far astray.


37. When you said to him whom God had blessed, and you had favored, “Keep your wife to yourself, and fear God.” But you hid within yourself what God was to reveal. And you feared the people, but it was God you were supposed to fear. Then, when Zaid ended his relationship with her, We gave her to you in marriage, that there may be no restriction for believers regarding the wives of their adopted sons,  when their relationship has ended. The command of God was fulfilled.


38. There is no blame on the Prophet regarding what God has ordained for him. Such is the pattern of God among those who passed before. The command of God is an absolute decree.


39. Those who deliver the messages of God, and fear Him, and never fear anyone except God. God is sufficient as a reckoner.


40. Muhammad is not the father of any of your men; but he is the Messenger of God, and the seal of the prophets. God is Cognizant of everything.


41. O you who believe, remember God with frequent remembrance.


42. And glorify Him morning and evening.


43. It is He who reaches out to you, and His angels, to bring you out of darkness into the light. And He is Ever-Merciful towards the believers.


44. Their greeting on the Day they meet Him is, “Peace,” and He has prepared for them a generous reward.


45. O prophet! We have sent you as a witness, and a bearer of good news, and a warner.


46. And a caller towards God by His leave, and an illuminating beacon.


47. And give the believers the good news that for them is a great reward.


48. And do not obey the blasphemers and the hypocrites, and ignore their insults, and rely on God. God is a sufficient protector.


49. O you who believe! When you marry believing women, but then divorce them before you have touched them, there is no waiting period for you to observe in respect to them; but compensate them, and release them in a graceful manner.


50. O Prophet! We have permitted to you your wives to whom you have given their dowries, and those you already have, as granted to you by God, and the daughters of your paternal uncles, and the daughters of your paternal aunts, and the daughters of your maternal uncles, and the daughters of your maternal aunts who emigrated with you, and a believing woman who has offered herself to the Prophet, if the Prophet desires to marry her, exclusively for you, and not for the believers. We know what We have ordained for them regarding their wives and those their right-hands possess. This is to spare you any difficulty. God is Forgiving and Merciful.


51. You may defer any of them you wish, and receive any of them you wish. Should you desire any of those you had deferred, there is no blame on you. This is more proper, so that they will be comforted, and not be grieved, and be content with what you have given each one of them. God knows what is within your hearts. God is Omniscient and Clement.


52. Beyond that, no other women are permissible for you, nor can you exchange them for other wives, even if you admire their beauty, except those you already have. God is Watchful over all things.


53. O you who believe! Do not enter the homes of the Prophet, unless you are given permission to come for a meal; and do not wait for its preparation. And when you are invited, go in. And when you have eaten, disperse, without lingering for conversation. This irritates the Prophet, and he shies away from you, but God does not shy away from the truth. And when you ask his wives for something, ask them from behind a screen; that is purer for your hearts and their hearts. You must never offend the Messenger of God, nor must you ever marry his wives after him, for that would be an enormity with God.


54. Whether you declare a thing, or hide it, God is Aware of all things.


55. There is no blame on them concerning their fathers, or their sons, or their brothers, or their brothers’ sons, or their sisters’ sons, or their women, or their female servants. But they should remain conscious of God. God is Witness over all things.


56. God and His angels give blessings to the Prophet. O you who believe, call for blessings on him, and greet him with a prayer of peace.


57. Those who insult God and His Messenger, God has cursed them in this life and in the Hereafter and has prepared for them a demeaning punishment.


58. Those who harm believing men and believing women, for acts they did not commit, bear the burden of perjury and a flagrant sin.


59. O Prophet! Tell your wives, and your daughters, and the women of the believers, to lengthen their garments. That is more proper, so they will be recognized and not harassed. God is Forgiving and Merciful.


60. If the hypocrites, and those with sickness in their hearts, and the rumormongers in the City, do not desist, We will incite you against them; then they will not be your neighbors there except for a short while.


61. They are cursed; wherever they are found, they should be captured and killed outright.


62. Such has been God’s precedent with those who passed away before. You will find no change in God’s system.


63. The people ask you about the Hour. Say, “The knowledge thereof rests with God. But what do you know? Perhaps the hour is near.”


64. God has cursed the disbelievers, and has prepared for them a Blaze.


65. Dwelling therein forever, not finding a protector or a savior.


66. The Day when their faces are flipped into the Fire, they will say, “If only we had obeyed God and obeyed the Messenger.”


67. And they will say, “Lord, we have obeyed our superiors and our dignitaries, but they led us away from the way. 


68. Lord, give them double the punishment, and curse them with a great curse.”


69. O you who believe! Do not be like those who abused Moses; but God cleared him of what they said. He was distinguished with God.


70. O you who believe! Be conscious of God, and speak in a straightforward manner.


71. He will rectify your conduct for you, and will forgive you your sins. Whoever obeys God and His Messenger has won a great victory.


72. We offered the Trust to the heavens, and the earth, and the mountains; but they refused to bear it, and were apprehensive of it; but the human being accepted it. He was unfair and ignorant.


73. God will punish the hypocrites, men and women, and the idolaters, men and women; and God will redeem the believers, men and women. God is Ever- Forgiving, Most Merciful.   

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